मुख्य बिंदु

✦ मुख्य बिंदु

  • माँ बगलामुखी हिंदू तंत्र में दस ब्रह्मांडीय ज्ञान-देवियों में आठवीं महाविद्या हैं।
  • देवी भागवत पुराण के अनुसार, वे हरिद्रा सरोवर — पवित्र हल्दी के सरोवर — के सुनहरे-पीले जल से जन्मी हैं।
  • उनकी प्रमुख दैवीय शक्ति है स्तम्भन — समस्त नकारात्मक शक्तियों को पंगु बनाने, मौन करने और पूर्णतः रोकने की सामर्थ्य।
  • वे प्रज्ज्वलित पीले-सुनहरे स्वरूप में, अमृत-सागर के मध्य एक सुनहरे सिंहासन पर विराजमान हैं।
  • वे बाएँ हाथ से दानव की जिह्वा खींचती हैं और दाहिने हाथ में सुनहरी गदा से प्रहार करती हैं — जो असत्य के मौन होने का प्रतीक है।
  • उनका प्राथमिक बीज मंत्र है ह्लीं — समस्त तांत्रिक परंपरा में सबसे शक्तिशाली बीज अक्षरों में से एक।
  • उनकी विशेष उपासना दतिया, मध्य प्रदेश के पीतांबरा पीठ में होती है — भारत का सबसे प्रसिद्ध बगलामुखी मंदिर।
  • मंगलवार, अष्टमी और बगलामुखी जयंती पर उपासना सर्वाधिक शुभ मानी जाती है।

आध्यात्मिक पृष्ठभूमि और उत्पत्ति कथा

माँ बगलामुखी की उत्पत्ति की कथा देवी भागवत पुराण में अंकित है और शाक्त प्रमोद तथा मुंडमाल तंत्र सहित विभिन्न तांत्रिक ग्रंथों में विस्तारित है।

अतीत के सत्ययुग में, ब्रह्मांड पर अभूतपूर्व शक्ति का एक प्रलयंकारी तूफान उठा। यह कोई साधारण तूफान नहीं था। यह एक ब्रह्मांडीय विनाश की घटना थी — एक प्रलय-स्तरीय विपदा जो समस्त सृष्टि को नष्ट कर देने का संकट लेकर आई थी। आकाश काला हो गया। सागर भयावह वेग से उठने लगे। पर्वत काँप उठे। प्रत्येक प्राणी पूर्ण विनाश के कगार पर काँपता रहा। स्वयं देवगण — ब्रह्मा, विष्णु, महेश — उसके प्रकोप के सामने असहाय थे।

पूर्ण निराशा में, समस्त देवगण सौराष्ट्र क्षेत्र में हरिद्रा सरोवर नामक एक पवित्र सरोवर के तट पर एकत्रित हुए — एक सुनहरा सरोवर जिसका जल हल्दी के रंग का था, तूफान के अंधकार में भी उष्ण और ज्योतिर्मय। उन्होंने एक साथ आदि शक्ति को — उस परम माता-चेतना को जो समस्त अस्तित्व का आधार है — पूर्ण समर्पण के साथ प्रार्थना की।